तिलकराम मंडावी/ डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ जैव विविधता से भरपूर है। इसका प्रमाण फिर से डोंगरगढ़ के जलाषयों में मिला है। जलाषय में साइबेरियन क्षेत्र का यूरेषियन क्रेन का झुंड दिखा है। जिनकी संख्या लगभग 20 है। यह सामान्यतः रूस, साइबेरिया व ठंड प्रदेषों में रहतें है। साथ ही ठंड में भारत के उत्तर-पष्चिम क्षेत्र खासकर राजस्थान, गुजरात में प्रवास करतें है। लेकिन छत्तीसगढ़ में पहली बार इन प्रवासी पक्षियों को जलाषयों में देखा गया है। ये पक्षी ठंड षुरू होनें के समय प्रवास में आतें है और गर्मी बढ़तें ही वापस अपनें देष लौट जातें है। इन पक्षियों को पहली बार पक्षी प्रेमी एसडीएम अविनाष भोई व प्रतीक ठाकुर ने अपनें कैमरे में कैद किया है। पक्षी विषेशज्ञ रवि नायडु ने यूरेषियन क्रेन का छत्तीसगढ़ में पहली बार देखे जानें की पुश्टि भी की। साथ ही वन विभाग के आईएफएस धम्मषील गणवीर व प्रषिक्षु आईएफएस श्री कुमार ने मौके पर पहुंचकर क्षेत्र की जैव विविधता का अवलोकन किया व प्रवासी पक्षियों के लिए छत्तीसगढ़ को उत्तम बताया। इन प्रवासियों को ठंडी जगह पसंद है और डोंगरगढ़ के जंगलों के जलाषयों में ठहरनें के लिए पक्षियों के झुंड ने डेरा डाला हुआ है। गर्मी का एहसास होनें के बाद ये अपनें देष लौट जाएंगे। फिलहाल पनियाजोब, डंगबोरा समेत ब्लॉक के जंगल के जलाषयों में प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी देखी जा रही है।
पहाड़ियों में भी विदेषी किंगफिषर की मौजूदगी- साल 2019 के अंत में डोंगरगढ़ के पहाड़ियों ने तीन प्रकार के किंगफिषर व जलाषय में विदेषी पक्षी देखें गए थे। ये विदेषी पक्षी लंबी दूरी तय करके भारत पहुंचतें है। विदेषों में बर्फबारी होने के बाद ज्यादा ठंड से बचनें के लिए हर साल उत्तर भारत को चुनतें है। जहां पर वे प्रजनन करके वापस अपनें देष में लौट जातें है। ब्लॉक के अलग-अलग पहाड़ियों में तीन तरह के किंगफिषर मिलें है। डोंगरगढ़ पहाड़ियों व घनें वनों से घिरे होने के कारण पक्षियों खासकर की पसंद है। वर्तमान में डोंगरगढ़ के आस-पास जल स्त्रोतों में आसानी से देखें जा सकते है। प्रसिद्ध चिड़िया किंगफिषर की तीन प्रजातियां यहां पर पाई गई है। जिनमें पाइड किंगफिषर, व्हाइट थ्रोटेड किंगफिषर व ब्लैक कैपेड किंगफिषर षामिल है। यदि इनकी चौथी प्रजाति भी दिखाई देती है तो यह डोंगरगढ़ की जैव विविधता का अद्भुत रिकार्ड होगा।
विदेषी जलीय पक्षियों ने जलाषयों को चुना- पनियाजोब जलाषय में रेडी षेल्डक, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, बार हेडिड गूज तीन तरह की जलीय पक्षी देखे गए है। ये प्रवासी जलीय पक्षी यूरोप व ठंड देषों में होने वालें बर्फबारी से बचनें के लिए इस ओर रूख करते है। प्रजाति सर्दियों के मौसम में तिब्बत, कजाकिस्तान, मंगोलिया, रूस आदि देषों से सफर तय करके हिमालय की उंची चोटियों के उपर से उड़ कर भारत में आतें है। पक्षी विषेशज्ञ रवि नायडु के मुताबिक ये पक्षियां तब तक भारत में रहती है जब तक उनके बच्चें उड़नें लायक नहीं हो जातें। उड़नें में सक्षम होने के बाद वे अपनें देषों की ओर लौट जातें है।
इनकी विदेषी पक्षियों की यह भी है खासियत
यूरेषियन क्रेनः लंबी टांगे व लंबी गर्दन व भूरे से सफेद रंग में पाया जाता है। साथ ही गर्दन व गला गहरे स्लेटी रंग का होता है। यह एक सर्वभक्षी पक्षी है। जो ज्यादातर पानी में चलना व रहना पसंद करतें है तथा पानी के व उसके आस-पास रहनें वालें चीजों को अपना खाना बनातें है। खास बात यह है कि ये तेजी से तैरती हुई मछली को एक ही वार में अपनें चोंच में दबोच लेते है।
रेडी षेल्डकः यह एक सुनहरे रंग का पक्षी है। यह साहित्य का चिरपरिचित पक्षी है। जैसे बुलबुल उर्दू साहित्य का। इसके कोक, कोकनद आदि अनके नाम है। लेकिन गांवों में चकवा-चकई के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह पक्षी वर्ग के हंस कुल का मंझोले कद का प्राणी है। इसे ब्राम्हणी बतक के नाम से भी जाना जाता है।
बार हेडिड गूजः इसे भारत में स्थानीय भाशा में बड़ा हंस या सफेद हंस भी कहते है। यह एक प्रवासी पक्षी है। जो सर्दियों के मौसम में भारत के अनेक हिस्सों में देखा जा सकता है। प्रवास के दौरान दलदली क्षेत्रों में, खेती के आस-पास वाली जगहों, पानी व चारा के नजदीक देखें जा सकते है, ये अधिकतर एक समूह में रहते है। यह दुनिया का सबसे उंचा उड़नें वाला पक्षी है।
एक्सपर्ट व्यू
सामान्यतः रूस, साइबेरिया व ठंड प्रदेषों में यूरेषियन क्रेन की रहतें है। लेकिन ठंड के दिनों में ये राजस्थान व गुजरात का रूख करतें है। लेकिन पहली बार छत्तीसगढ़ में इनकी मौजूदगी देखी गई है। वन तथा जल स्त्रोतों को अपना आसियाना बनाकर प्रजनन करते है। ठंड खत्म होने के बाद ये पक्षी वापस अपनें देषों में लौट जातें है। यह गौरव की बात है कि विदेषी पक्षियों ने डोंगरगढ़ अंचल को चुना है।
रवि नायडु, पक्षी विषेशज्ञ

