Sabarimala Case: नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालत को यह अधिकार है कि वह किसी धार्मिक प्रथा में अंधविश्वास है या नहीं, इसकी जांच कर सके।
जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल संसद ही अंतिम निर्णय लेने वाली संस्था नहीं है, बल्कि अदालत भी यह तय कर सकती है कि कोई प्रथा संवैधानिक मानकों पर खरी उतरती है या नहीं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सती प्रथा, जादू-टोना और नरबलि जैसे उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई प्रथा समाज के लिए हानिकारक है, तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि क्या अंधविश्वास है, क्योंकि धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग समाजों में भिन्न होती हैं। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर किसी प्रथा को धर्म के नाम पर जायज ठहराया जाए, तो क्या उसे जांच से बाहर रखा जा सकता है?
बेंच के अन्य जजों ने भी कहा कि अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर हस्तक्षेप कर सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी प्रथा को ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ मानने से पहले उसकी गंभीरता और प्रभाव का आकलन जरूरी है।
गौरतलब है कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर यह मामला लंबे समय से चर्चा में है, जो महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

