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पुरखा के सुरता : जनम के 100 बछर : पं. श्यामलाल चतुर्वेदी…एक छत्तीसगढ़ी आत्मा – डॉ. वैभव बेमेतरिहा

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रायपुर: छत्तीसगढ़ अपन अकार म जादा बड़का तो नइहे. फेर तिर मँ आके देखबे त इहाँ वो सबकुछ दिखते जउन एक धनवान परदेस म होथे. नदियाँ, पहाड़, जँगल, उपजऊ भुइँया, खेत-खार, पानी, बिजली, कोयला, टीना-लोहा, हीरा अउ भुइँया के छाती खोद पानी ओगरइया मेहनती मनखे. वो सब जिनिस जेन एक फूले-फरे परदेस म होना चाही. फेर इहाँ खुसहाली के संग उपेक्छा के पीरा घलोक हे. अपन सपना पूरा नइ हो पाय के मलाल भी हे. तभो ले सीधवा-साधा छत्तीसगढ़ के चेहरा मँ मुस्कई लहर मारथे. अइसने हर हाल म खुस अउ मजा म डूबे होय के अहसास ले भरे छत्तीसगढ़ के चेहरा मेल खाते एक चेहरा ले. नाँव हे पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी.

 

एक अइसे मनखे जिंखर जिनगी नदिया सही निरमल-निस्छल. पहाड़ सही बिसाल. जंगल सही सांत अउ गंभीर. हरियर खेत सही उन्नत . बड़े-बड़े बिजली घर सही उरजा ले भरपूर रहे हे. एक अइसे मनखे जिंखर रग-रग मँ, नस-नस मँ छत्तीसगढ़ी बसय. जेन छत्तीसगढ़ी खावय, छ्तीसगढ़ी पहिनय, छत्तीसगढ़ी गावय, छत्तीसगढ़ी सुनावय. जिंखर पूरा के पूरा जिनगी छत्तीसगढ़-छत्तीसगढ़ी मय रहे हे. आवव जानिन अइसन छत्तीसगढ़ी आत्मा के जिनगानी ल…

 

*सहर म 70 बरस के जिनगी गुजारे के बाद घलोक सफेद धोती, खादी के कुरथा अउ जाकिट ठेठ देसीपनवाला पहिरे पं. श्यामलाल चतुर्वेदी रहिन त ठेठ गँवइहाँ. गँवइहाँ होना उँखर बर सरम के नइ गरब के बात रहय. उन सब ल गरब के संग इही कहय, ‘देहाती होना ही मोर छत्तीसगढ़ी होय के परमान हरय. मोर रंग-रूप, मोर बोली-भासा सब म मोर गाँव बसे हे. दाई भासा बोले म भला का के लाज अउ सरम.’*

 

संगीतकार, साहित्यकार, पत्रकार अउ गुरुजी सही परभावकारी मनखे के धनी पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी के जिनगी के सुरवात जाँजगीर जिला मँ अकलतरा के कोटमीसोनार गाँव ले होथे. बिक्रम संवत १९८२ फागुन के सुकुल पाख मँ अस्टमी तिथि मँ २० फरवरी सन् १९२६ तारीख के माटी के छोटकन मकान म लइका के रोय के गुहार पड़िस अउ एक झिन सोन सही रंगधारी लइका ह जनम लिस.

 

वो कहिथे न जेन असधारन होथे वो ह जनम के संगे-संग अपन छाप छोड़त चले जाथे. बछर ले बछर जइसे-जइसे श्यामलाल जी बड़े होवत गइन अपन परतिभा के परदरसन करत गइन. तब के बखत मँ जब कोनो लइका ह ६ बछर ले पहिली इस्कूल मेर घलोक नइ भटकत रहिन वो बखत मँ चतुर्वेदी जी के इस्कूल म परवेस ५ बरिस म ही होगे रहिस. ९ बछर के उमर मँ चौथी पास कर डरे रहिन. चौथी पास होय के बाद घरवाले मन अकलतरा के एक ठिन रहे-खाय वाला इसकूल म पाँचवी मँ भरती करा दिन. फेर दाई ले दूरिहा रहिना चतुर्वेदी जी ल नइ सहन होइस अउ बीच मँ ही पढ़ई छोड़ के गाँव आगिन.

 

बखत गुजरत गिस अउ केलेंडर पर दरज होइस सन् १९४०. ये वो बछर रहिस जब श्यामलाल जी के बिहाव होइस. 16 बछर के कम उमर मँ चतुर्वेदी जी के बिहाव उँखर ले जियादा पढ़े-लिखे नोनी नरमबदा ले करा दे गिस. सिक्छित ससुरार के असर अइसे होइस के मन फेर पढ़ई कोति लग गे. सन् 1941 मँ अकलतरा के माध्यमिक इस्कूल म प्राइबेट छात्र के रुप पांचवी के परीक्छा म सबले जादा नंबर लेके पूरा इस्कूल म अव्वल रहिन. पढ़ई के संग-संग रुझान साहित्य कोति घलो गिस.

 

इही दउरान भारतेन्दु साहित्य समित ले भी जुड़ के साहित्य सम्मेलन मन सामिल होना जारी रहिस. डॉ.शिवमंगल सुमन अउ मुकुट धर पांडेय जइसे कवि मन संगी हो गे रहिन. कविता के संग-संग, कहिनी, निबंध भी लिखना सुरू होगे. कविता के परसारन आकासबानी म होय लगिस. सन् १९४९ म छत्तीसगढ़ी कविता के परसारन नागपुर केन्द्र ले होइस. बाद म भोपाल, रइपुर, अउ बेलासपुर आकासबानी ले रचना मन के परसारन होवत रहिस. दूरदरसन रइपुर अउ भोपाल केन्द्र ले घलोक आपके कविता परसारित होइस. अतेकच नइ दिल्ली दूरदसरन केन्द्र ले कहिनी घलोक परसारित होइस. इही दउर म भारत अउ यूनेस्को दूरदरसन कोति ले २०-२० चुने हुए लोककथा मन के अदान-परदान ल लेके अनुबंध होय रहिस. तब ये अनुबंध मँ चतुर्वेदी जी के दू ठिन लोककथा सामिल करे गे रहिस.

 

 

सन् १९४८ ये वो बछर रहिस जब चतुर्वेदी जी पत्रकारिता के रद्दा म पहिली कदम रखे रहिन. पत्रकार भी बनिन तो गाँव के गुरुजी के कहिय म. फेर अचरज के बात तो ये रहिस के तब तक सिरिफ पाँचवी ही पास रहिन. फेर खास बात ये रहिस के पत्रकारिता गाँव मँ ही रइ के करत रहिन.

 

सन् १९५७ ये वो ऐतिहासिक बछर रहिस जेन चतुर्वेदी जी के जिनगी ल एक नवा मोड ल दिस. साहित्यकार अउ पत्रकार के जिनगी मँ राजनीति सामिल होगे. अचरच के बात राजनीति मँ आना नइ, बल्कि अंचभा तो ये रहिस के कांगरेसी परवित्ती वाले चतुर्वेदी जी राजनीति मँ अइन त आरएसएस कोति ले. जनसंघ वाले मन चतुर्वेदी जी ल अकलतरा विधानसभा सीट से ले चुनाव लड़ाए के फइसला करिन. वो सीट ले चुनई मैदान म उतारे गिन जिहाँ कांगरेस, अउ ठाकुर राजपरिवार के खिलाफ कोनो लड़त नइ रहिन. जनसंघ के टिकट म राजपरिवार अउ कांगरेस के खिलाफ दमदारी ले लड़िन . हालांकि चुनाव नइ जीत सकिन. फेर ये चुनई के खास बात ये रहिस की चतुर्वेदी जी सइकिल ले ही सादगी के संग परचार करिन अउ परचार म कुल साढ़े सैंतीस रुपिया ही खरच होइस.

 

सन् १९५७ ये वो बछर रहिस जेन चतुर्वेदी जी ल जिनगी म एक घव फेर राजनीति के रद्दा म लेगे. होइस ये के विधायक तो नइ फेर कोटमी के सरपंच संघ अउ गाँव वाले मन जरूर बना दिन. सरपंच रहत गाँव के बिकास बर दारू भट्टी बंद कराना, जुआँ बंद कराना, पेड़ लगाना, हाईस्कूल खुलवाना, कोटमी रेल्वे स्टेसन सुरू करवाना जइसे अड़बड़ अकन बुता कराइन. १९५९ म तत्कालीन केन्द्रीय रेल मंत्री जगजीवन राम जब बेलासपुर दउरा के दउरान कोटमी आए रहिन…तब उंखर ले कोटमी म रेलवे इस्टेसन सुरु करे के सुकुरिती कर ले रहिन. वो बखत कोटमी तब बेलासपुर के पहली फलेग स्टेसन रहिस.

 

 

पाँच बरिस सरपंची करे के बाद पत्रकारिता म फेर वापसी होइस. पत्रकारिता के ये वो बेरा रहिस जब समाचार भेजे पर भारी उधिम करे ल परत रहिस. पत्रकारिता के ललक चतुर्वेदी जी ल गाँव ले खींच के बिलासपुर ले आइस. फेर सिरिफ पत्रकारिता ले जिनगी के गुजारा नइ होने वाला रहिस. ते पाए के जनभागीदारी ले संचालित छत्तीसगढ़ बिद्यालय म गुरुजी के नउकरी घलोक करिन. गुरुजी के नउकरी के संग पत्रकारिता चलत रहिस. बिहनिया इस्कूल अउ फेर बाकी बेरा पत्रकारिता.

 

सन् १९५२ ले लेके ७९ तक हिन्दुस्थान समाचार समिति के बिलासपुर परतिनिधि. १९८२ नई दुनिया के बिलासपुर जिला परतिनिधि. फेर नई दुनिया के छत्तीसगढ़ राज्य परतिनिधि. बिलासपुर ले ही निकलइया समाचार-पत्र लोक-स्वर के संपादक. एखर अलावा सिक्छक संदेस अउ छितिज तिमाही पत्रिका के घलोक संपादन भी करिन.

 

मेट्रिक के सिक्छा बनारस ले सन् १९५६ म पराइबेट करिन. फेर कला बिषय म १९६८ मँ बीए अउ १९७६ म एमए पंडित रविशंकर शुक्ल बिश्वबिद्यालय रायपुर ले करिन .एला संयोग कहव के एमए के एक्छिक बिसय छत्तीसगढ़ी के परीक्छा म चतुर्वेदी जी ल उँखरे लिखे कविता के ऊपर सवाल पूछे गे रहिस.

 

छत्तीसगढ़ राज बने के बाद जब छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाए बर आवाज बूलंद होय लगिस. त सब आंदोलनकारी छत्तीसगढ़ी परेमी मन संग चतुर्वेदी जी घलोक मुखर रहिन. आखिरकार २८ नवंबर २००७ के दिन सरकार छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा दे दिस. सरकार डहर ले छत्तीसगढ़ी के पचार-परसार बर छत्तीसगढ़ी राजभासा आयोग के गठन करे गिस. छत्तीसगढ़ी के परति चतुर्वेदी जी के समपरन ल देख के सरकार कोति ले राजभासा आयोग के पहली अध्यक्ष बनाए गइन.

 

 

चतुर्वेदी जी के प्रकासित साहित्य मन मँ सन् १९५४ म छत्तीसगढ़ी म रामबनवास (रामचरित मानस के कुछ भाग के छत्तीसगढ़ी दोहा मँ अनुवाद). छत्तीसगढ़ी कहिनी संग्रह भोलवा भोलाराम बनिस. छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह पर्रा भर लाई. हिन्दी निबंध संगरह मेरे निबंध बिसेस हे. एखर अलावा कई छत्तीसगढ़ी गीत, लोककथा अउ स्मृति सेस भी लिखे रहिन. अप्रकासित रचना मन मँ छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य, छत्तीसगढ़ी लोककथाएं, स्मृति शेष विभूतियाँ अउ मेरी कलम से प्रमुख हे.

 

चतुर्वेदी जी के व्यक्तिव एंव कृतित्व बिसय मँ १९८६-८७ म गुरु घासीदास बिस्वबिद्यालय बिलासपुर ले लघु शोध-प्रबंध भी अउ पंडित रविशंकर शुक्ल बिस्वबिद्यालय मँ समकालीन छत्तीसगढ़ी काव्य के संदर्भ म पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी के काव्य अनुशीलन बिसय मँ पीएचडी बर शोध प्रबंध होय हे.

 

चतुर्वेदी जी के चर्चित काव्य संग्रह पर्रा भर लाई रहिस. येमा सामिल दू ठिन कविता म एक बेटी के बिदा अउ दूसर जबड़ पुस्टिय भरे छत्तीसगढ़ के बासी मँ खूब पढ़े अउ सुने गिस. बेटी के बिदा कविता चतुर्वेदी जी अमर रचना कहे जाथे. ये कविता ल उन तब लिखे रहिन, जब पत्नी नरबदा ले बर पहिली बार ससुराल गे रहिन. ससुराल वाले मन बिदाई के दउरान फूट-फूट के रोय लागिन त उँखर अंतस ले ये बेटी के बिदा सबद निकले रहिस.

चतुर्वेदी जी ल पत्रकारिता अउ साहित्य के सेवा बर भारत सरकार कोति ले साल 2018 मँ पदमश्री सम्मान , 2004 मँ छत्तीसगढ़ राज अलंकरन सहित अड़बड़ अकन सम्मान सामिल हे.

 

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