छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023
बेलतरा सीटिंग विधायक रजनीश सिंह की टिकट आखिर क्यों कटी….?
– सुरेश सिंह बैस
बिलासपुर। आखिर बेलतरा विधानसभा से भाजपा के सिटिंग विधायक रजनीश सिंह की टिकट क्यों कटी….,? यह यक्ष प्रश्न चिन्ह आज भी बना हुआ है। वैसे सरसरी तौर पर देखा जाए तो विधायक महोदय की लोकप्रियता और जन समर्थन में कोई कमी दिखाई नहीं देती थी। और न हीं वे किसी कदाचरण के दोषी थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि एक कर्मठ और साफ-सुथरी छवि वाले शांत गंभीर विधायक को पार्टी ने टिकट नहीं दिया। क्या इसके पीछे विधायक रजनीश सिंह की भी सहमति थी। वैसे गत दिनों से देखा भी जा रहा था कि रजनीश सिंह के हाव भाव व गतिविधियां भी कुछ बदली बदली सी थी।वे प्राय पिछले महीना से जब टिकट देने की प्रक्रिया चल रही थी तभी से वे टिकट पाने के प्रति कोई रूचि नहीं प्रदर्शित कर रहे थे। बल्कि वह अपने जनसंपर्क के दौरान प्रायः लोगों से चर्चा करते हुए दिखाई देते थे कि मैं टिकट के प्रति लालायित नहीं हुं ,बल्कि मैं तो पार्टी के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हुए पार्टी हित में काम करने वाला एक कार्यकर्ता हूं। उनकी यही भंगिमा और उद्बोधन से इंगित होने लग गया था कि वह भी जानते थे कि वह इस बार के चुनाव में टिकट नहीं प्राप्त कर रहे हैं। तो क्या उन्होंने किसी भी प्रकार से समझौता कर लिया था अथवा चुनाव लड़ने के अनिच्छुक थे। आखिरकार वही हुआ जो दिखाई दे रहा था टिकट बेलतरा से सुशांत शुक्ला को दे दी गई। वैसे भाजपा के विधायक प्रत्याशी सुशांत शुक्ला के कार्यकर्ता महिनों पूर्व से आस्वस्त थे की टिकट उनको मिल रही है। और वे क्षेत्र में जाकर जन समर्थन व जनसंपर्क करना प्रारंभ कर चुके थे। सुशांत शुक्ला के पास ऐसा क्या ब्रह्मास्त्र था कि उनके कार्यकर्ता श्री शुक्ला के टिकट के प्रति पूरी तरह से आस्वस्त थे। वही दूसरी और देखा जाए तो सिटिंग विधायक रजनीश सिंह पूरी तरह से साथ शांत गंभीर नजर आ रहे थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो। शायद उन्हें भी पार्टी आलाकमान के फैसले में यह दिखाई देने लग गया था कि उन्हें टिकट नहीं प्राप्त हो रही है। तो क्या उन्होंने कोई पार्टी के साथ समझौता किया या फिर बिलासपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। क्योंकि वैसे भी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष जो बिलासपुर लोकसभा के संसद सदस्य हैं वह लोरमी में विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। और अगर वे चुनाव जीत जाते हैं तो बिलासपुर लोकसभा से उनकी दावेदारी खत्म हो जाती है। दूसरी बात यह समझ नहीं आ रही है कि एक कर्मठ व धीर गंभीर जो अपने क्षेत्र में खासे लोकप्रिय किसी प्रकार का दाग नहीं होने के बावजूद उन्हें टिकट क्यों नहीं दी गई। क्या यह जातीय समीकरण का खेल था या संगठन में कोई बड़े पद में जा रहे हैं फिर कुछ और..? अगर इस जातीय समीकरण माना जाए तो कांग्रेस में भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ है! लोरमी के कर्मठ व लोकप्रिय कार्यकर्ता सागर सिंह बैस जो पूर्ण रूप से लोरमी में विधानसभा के प्रत्याशी के लिए उपयुक्त थे लेकिन लगता है कि आखिरकार वह भी जातीय समीकरण से मात खा गए। उनसे भी दिग्गज नेता तखतपुर से रश्मि सिंह को पार्टी का टिकट प्राप्त हो चुका था। हालांकि यह दीगर बात है कि वह जोगी कांग्रेस का दामन थाम कर चुनावी मैदान में पूरे दमखम के साथ आ चुके हैं। देखें उनकी किस्मत क्या रंग लाती है।