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तिरछी नजर 👀 : टेकाम के इस्तीफ़े की दिलचस्प कहानी… ✒️✒️

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सरल-सहज दिखने वाले मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम ने इस्तीफ़ा लेने वालों के पसीने निकाल दिये। इस्तीफ़ा सौंपने से पहले उन्होंने सत्ता-संगठन और प्रशासन को जमकर छकाया। पूरी कहानी दिलचस्प है। टेकाम को सीएम हाउस में विधायक दल की बैठक के दौरान ही कांग्रेस आलाकमान का फ़रमान सुना दिया गया। पटकथा तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की नियुक्ति के दिन लिख दी गयी थी। रणनीति बनाई गयी कि मोहन मरकाम को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाये। कई आदिवासी नेताओं के नाम पर विचार करने के बाद प्रेमसिंह टेकाम को हटाने पर सहमति बनी। यह खबर मिलने के बाद नाराज टेकाम बिना इस्तीफा दिये सीएम हाउस से रवाना हो गये। उनका मोबाइल बंद हो गया। टेकाम की तलाश में नेताओं व अफसरों की टीम लगा दी गई। काफ़ी मशक्कत के बाद वे मिले तो व्यवस्थापन के ठोस आश्वासन के बाद इस्तीफ़ा देने तैयार हो पाये। दोपहर एक सादे काग़ज़ में उनका इस्तीफा सीएम हाउस पहुँचा, जिसमें तारीख़, स्थान आदि का उल्लेख नहीं था। इस्तीफ़ा देकर टेकाम अम्बिकापुर चले गये। शासन-प्रशासन फिर परेशान हो गया। उनसे दोबारा इस्तीफा लिखवाने एक टीम अम्बिकापुर भेजी गई। तब तक संशय की स्थिति बनी रही। दूसरे दिन शपथ ग्रहण समारोह होना था। दिनभर तमाम दिग्गजों की कवायद के बाद इस्तीफा स्वीकृति सहित नये मंत्री की शपथ, विभागों के बँटवारे जैसे कामों को कानूनी जामा पहनाया गया। तब कहीं जाकर गुलदस्तों के साथ भूपेश और मरकाम की मुस्कुराती हुई तस्वीर सामने आ पाई।

विवाद पर पर्दा

पीएम नरेंद्र मोदी की रायपुर की सभा भीड़ के मामले में सफल तो रही, लेकिन सभा के पहले जो कुछ हुआ, उसके किस्से अब जाकर छनकर बाहर निकल रहे हैं।
बताते हैं कि पीएम के आने से पहले दो पूर्व मंत्रियों के बीच जमकर कहा सुनी हुई। बात इतनी ज्यादा बढ़ गई थी कि कुछ और नेताओं को बीच बचाव में आगे आना पड़ा।
यही नहीं, पास को लेकर भी काफी विवाद हुआ था। बताते हैं कि पड़ोस के एक पूर्व जिला अध्यक्ष, जिन्हें पास देने की जिम्मेदारी दी गई थी उनसे मिलने पार्टी दफ्तर में नशे में धुत एक नेता पहुंच गए और अब जब पास देने में आनाकानी की, तो नशे में धुत नेता ने इतनी गालियाँ दी कि घबरा कर पूर्व जिला अध्यक्ष उन्हें मांग के अनुसार पास दे दिए। और दोनों एक ही समाज से आते हैं और इस वजह से चाहकर भी पार्टी फोरम में बात नहीं रख सके।

दिग्गजों की टिकट को खतरा

भाजपा भूपेश सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हमलावर हो रही है। पार्टी के लोगों को अंदेशा भी है कि इंदिरा प्रियदर्शनी बैंक घोटाला केस सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को कमजोर कर सकता है। बताते हैं कि बैंक के पूर्व मैनेजर उमेश सिन्हा ने नार्को टेस्ट में जिन नेताओं के नाम उगले हैं, उन सबकी टिकट काटी जा सकती है।
थोड़ी दिक्कत पूर्व सीएम डां रमन सिंह और बृजमोहन अग्रवाल को लेकर हैं। क्योंकि दोनों वर्तमान में भी विधायक हैं। ऐसे में दोनों को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा जा सकता है। पार्टी क्या रणनीति अपनाती है, यह जल्द पता चलेगा।

बदलेंगे तीन कलेक्टर ‌?

विधानसभा चुनाव को देखते हुए तीन जिलों के कलेक्टर और कुछ डिप्टी कलेक्टरों के तबादले की सूची जारी हो सकती है। कुछ जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में मनपसंद अफसरों की पदस्थापना की कोशिश में भी लगे हैं। प्रदेश के नवगठित जिलों में से तीन जिलों में बेहतर तरीके से काम नहीं होने की शिकायतें आ रही है। इन तीनों जिलों में नये नामों पर विचार विमर्श चल रहा है। अगले सप्ताह सूची निकलने की संभावना है।

जमे हैं आईएफएस अफसर…

वन विभाग के जिम्मेदार बड़े आईएफएस अधिकारी पिछले कई वर्षो से रिटायर ही नहीं हो रहे हैं। आईएएस अधिकारियों से ज्यादा पुर्नवास आईएफएस अफसरों की हो चुकी है। हाल ही में कुछ और रिटायर्ड अफसरों को आगामी दिनों पोस्टिंग हो सकती है। जिन रिटायर्ड अफसरों को पोस्टिंग दी गई है उनमें आरके सिंह नवाचार आयोग,राकेश चतुर्वेदी, संजय शुक्ला एसएस बजाज ,पीसी मिश्रा, देवाशीष दास ,बीपी नोन्हारे, बीएल शरण , अनूप श्रीवास्तव , के सुब्रमणियम सहित कई पहले से काम कर रहे हैं।

भाजपा के ‘पंच प्यारे’

अरुण साव, केदार कश्यप, विजय शर्मा, विधायक सौरभ सिंह और ओपी चौधरी- ये हैं भाजपा के पंच प्यारे। बदलाव के दौर से गुजर रही छत्तीसगढ़ भाजपा इन्हीं पाँच नेताओं के इर्द-गिर्द घूम रही है। नीति निर्धारण से लेकर नियुक्तियों और बड़े आयोजनों में इस टीम की चल रही है। बताते हैं कि इस टीम को प्रदेश प्रभारी ओम माथुर ने बनाया है। इसके ज़रिए उन्होंने सत्ता और संगठन की चाबी अपने हाथों से नहीं देने वाले पुराने दिग्गजों को ठिकाने लगा दिया है। टीम में वैश्य समाज को जगह नहीं दी गई है। इस कारण समाज के कई नेताओं को टिकट की चिंता सताने लगी है। ऐसे नेता अब माथुर के गृह प्रदेश राजस्थान के कनेक्शन टटोलने में जुट गये हैं। माथुर पर इन कोशिशों का कोई असर नहीं होना है। असल में उन्हें मिशन बदलाव के तहत ही यहाँ भेजा गया है, जिसके लिये वे विख्यात हैं।

कांग्रेस के महंत

स्पीकर डॉ चरणदास महंत सिर्फ़ नाम के महंत नहीं हैं। संवैधानिक दायित्व निभाते हुए भी उनकी महंताई कांग्रेस में चल रही है। प्रदेश प्रभारी सैलजा हर फ़ैसले से पहले उनकी सलाह ज़रूर लेती है। पार्टी की कुछ बैठकों में भी वे नज़र आ जाते हैं। विधानसभा के मॉनसून सत्र के बाद उन्हें पार्टी में अहम चुनावी ज़िम्मेदारी मिल सकती है। वे तैयार भी हैं। ज़ाहिर है कुछ टिकटों पर उनकी पसंद को भी तवज्जो दी जाएगी। वे इकलौते नेता हैं, जिनकी हर सलाह कांग्रेस मान रही है।

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