नवागढ़ बेमेतरा संजय महिलांग
परिवर्तन ही प्रकृति का नियम हैं इवोल्यूशन और एक्सटिंशन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब आवश्यकता होती हैं प्रकृति द्वारा कुछ नवीन प्रजातियां विकसित होती हैं और समय के साथ कुछ का जीव विलुप्त हो जाता है। किंतु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर एक प्रजाति कुदरत में एक खास किस्म की भूमिका अदा करती है।
जब उस प्रजाति का प्राकृतिक तरीके से धीरे-धीरे यानी लाखों-हजारों सालों में विलोप होता है तो कुदरत उसके काम को धीरे-धीरे किसी और को सौंपने लगती है। उस खास प्रजाति के विलोपन का ज्यादा असर नहीं पड़ता है और कुदरत के नियम चलते रहते हैं।
परंतु विभिन्न प्रजातियों के विलोप होने की यह प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती है तो प्रकृति के सारे नियम बिगड़ जाते हैं। उसका प्राकृतिक चक्र प्रभावित हो जाता है। इस पृथ्वी में अभी इंसानों के अलावा दूसरी प्रजातियों के साथ फिलहाल यही हो रहा है। आज मनुष्य की स्थिति में अन्य प्रजातियों के विलुप्त होने की प्रक्रिया बेहद तेज हो गई है। इसे सामान्य से 300 से 1000 गुना तक तेज माना जा रहा है।
वर्तमान समय में इन प्रजातियों के विलुप्त होने की यह गति इतनी ज्यादा तेज है कि प्रकृति खुद इसका संतुलन नहीं बना पा रही है।
आज कीटों की आबादी पर भारी संकट छाया हुआ है। कीटों की चालीस फीसदी तक आबादी पर तबाह होने का खतरा है। मैमेल, पक्षी और रेप्लटाइल की तुलना में इंसेक्ट आठ गुना ज्यादा तेजी से विलुप्त हो रहे हैं।
पर्यावरण प्रदूषण,जलवायु परिवर्तन,वातावरण में रसायनों की बढ़ोतरी आदि ऐसे कारण है जो इनकी जान ले रहे हैं। अलग-अलग इंसेक्ट पौधों में परागण से लेकर तमाम ऐसे काम करते हैं, जिनके बिना पृथ्वी पर मानव या अन्य प्रजातियों के अस्तित्व के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। बहुत सारे पक्षियों का वे भोजन भी हैं। उनके समाप्त होने के बाद उन पक्षियों का जीवन भी समाप्त हो जाएगा। निसंदेह कुछ कीट इंसानों के लिए हानिकारक भी हैं, लेकिन पारिस्थितिक तंत्र तो ऐसे ही बनता है।
इंसेक्ट यानी कीट बहुत छोटे होते हैं। लेकिन,हमारे ईकोसिस्टम में उनका रोल किसी सुपरमैन या स्पाइडरमैन से कम नहीं है।
जरूरत इस कीट जीवन को ज्यादा से ज्यादा जानने-समझने की है।
युवा किसान किशोर कुमार राजपूत ने किसानों से जैविक खेती कर इन प्रजातियों को संरक्षित करने की अपील की हैं।