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गोबर खाद के प्रयोग से बढ़ाया मिट्टी की उर्वरा क्षमता

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  • वर्मी कंपोस्ट को मिट्टी में मिलाने से इसकी उर्वरा क्षमता तो बढ़ती ही है, साथ ही साथ फसल की

संजय महिलांग/नवागढ़/बेमेतरा : वर्मी कंपोस्ट को मिट्टी में मिलाने से इसकी उर्वरा क्षमता तो बढ़ती ही है, साथ ही साथ फसल की पैदावार व गुणवत्ता में भी व्यापक बढ़ोतरी होती है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मृदा पर होने वाले दुष्प्रभाव को वर्मी कंपोस्ट से कम किया जा सकता है। यह भूमि की भौतिक, रासायनिक व जैविक दशा में सुधार कर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को टिकाऊ बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान करता है। नवागढ़ के युवा प्रगतिशील किसान किशोर कुमार राजपूत बताते हैं कि एक किग्रा भार में 1000 से 1500 केंचुए होते हैं। एक केंचुआ दो-तीन कोकून प्रति सप्ताह पैदा करता है। एक केंचुआ अपने जीवन में लगभग 250 केंचुए पैदा करने की क्षमता रखता है। नवजात केंचुआ लगभग 6-8 सप्ताह पर प्रजननशील अवस्था में आ जाता है। प्रतिदिन एक केंचुआ लगभग अपने भार के बराबर मिट्टी, खाकर कम्पोस्ट में परिवर्तित कर देता है। एक किग्रा केंचुआ एक वर्ग मीटर क्षेत्र में 45 किलोग्राम अपघटनशील पदार्थों से 25 से 30 किग्रा वर्मी कंपोस्ट 60 से 70 दिनों में तैयार कर देते हैं।

वर्मी कंपोस्ट बनाने की सामान्य विधि

किशोर कुमार राजपूत ने बताया कि वर्मी कंपोस्ट खाद निर्माण करने में केंचुओं की उन प्रजातियों का चयन किया जाता है जिनमें प्रजनन व वृद्धि दर तीव्र हो। प्राकृतिक तापमान के उतार चढ़ाव सहने सहित कार्बनिक पदार्थों को शीघ्रता से कंपोस्ट में परिवर्तित करने की क्षमता हो। आइसीनियां फीटिडा, यूडिलस, यूजेनी तथा पेरियोनिक्स एकस्केवेटस आदि प्रजाति उपयोगी होते हैं।

वर्मी कंपोस्ट में जैव-क्षतिशील कार्बनिक पदार्थ जैसे गाय, भैस, भेड़, गधा, सुकर तथा मुर्गियों आदि का मल, बायोगैस स्लरी, शहरी कूड़ा, प्रौद्योगिक खाद्यान्न व्यर्थ पदार्थ, फसल अवशेष, घास-फूस व पत्तियां , रसोई घर का कचरा आदि का उपयोग किया जा सकता है। कंपोस्ट किसी भी प्रकार के पात्र जैसे मिट्टी या चीनी के बर्तन, वाश बेसिन, लकड़ी के बक्से, सीमेंट के टैंक इत्यादि में किया जा सकता है। गड्ढों या बेड की लंबाई-चौड़ाई उपलब्ध स्थान के अनुसार निर्धारित करें इनकी गहराई या ऊंचाई 50 सेमी से अधिक न रखें। कंपो¨स्टग के लिए सबसे नीचे की सतह 5 सेमी मोटे कचरे (घास-फूस,केले के पत्ते, नारियल के पत्ते, फसलों के डंठल आदि) की तह बिछाएं l

इसी पर सड़े हुए गोबर की 5 सेमी की तह बनाएं तथा पानी छिड़क 1000-1500 केंचुए प्रति मीटर की दर से छोड़ें। इसके ऊपर सड़ा गोबर और विभिन्न व्यर्थ पदार्थ जिनसे खाद बनाना चाहते (10:3 के अनुपात में) आंशिक रूप से सड़ाने के बाद डालें तथा टाट या बोरी से ढक दें। इस पर पानी का प्रतिदिन आवश्यकतानुसार छिड़काव करें ताकि नमी का स्तर 40 प्रतिशत से ज्यादा रहे। कंपो¨स्टग हेतु छायादार स्थान का चुनाव करें जहां पानी न ठहरता हो। 60 से 70 दिन में कंपोस्ट बन कर तैयार हो जाती है। इस अवस्था में पानी देना बंद कर देंl जिससे केंचुए नीचे चले जाएं तब कंपोस्ट को एकत्र कर, छान कर केंचुए अलग करें तथा छाया में सुखाकर प्लास्टिक की थैलियों मे भरकर सील कर दें।

वर्मी कंपोस्ट डालने से खेतो में होने वाले लाभ

किशोर राजपूत बताते हैं कि वर्मी कंपोस्ट में गोबर की खाद (एफवाइएम) की अपेक्षा नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा अन्य सूक्ष्म तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। वर्मी कंपोस्ट के सूक्ष्म जीव, एंजाइम्स, विटामिन तथा वृद्धिवर्धक हार्मोन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। केंचुआ द्वारा निर्मित खाद को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की उपजाऊ एवं उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पौधों की वृद्धि पर पड़ता है। वर्मी कंपोस्ट वाली मिट्टी में भू-क्षरण कम होता है तथा मिट्टी की जलधारण क्षमता में सुधार होता है। खेतों में केंचुओं द्वारा निर्मित खाद के उपयोग से खरपतवार व कीड़ों का प्रकोप कम होता है तथा पौधों की रोग रोधक क्षमता भी बढ़ती है। वर्मी कंपोस्ट के उपयोग से फसलों पर रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों की मांग कम होती है जिससे किसानों का इन पर व्यय कम होता है। वर्मी कंपोस्ट से प्राकृतिक संतुलन बना रहता है, साथ ही भूमि, पौधों या अन्य प्राणियों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।

इस प्रकार से करें वर्मी कंपोस्ट का उपयोग

किशोर राजपूत बताते हैं कि वर्मी कंपोस्ट को तैयार करते समय मिट्टी में मिलाएं। खाद्यान्न फसलों में वर्मी कंपोस्ट 5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। सब्जी वाली फसलों में वर्मी कंपोस्ट का उपयोग 10-12 टन प्रति हेक्टेयर करें। फलदार वृक्षों में एक से 10 किग्रा आयु व आवश्यकतानुसार तने के चारों तरफ घेरा बनाकर डालें। गमलों में सौ ग्राम प्रति गमले की दर से उपयोग करें।

वर्मीकम्पोस्ट के प्रयोग में विशेष सावधानियां

आंशिक रूप से सड़े कार्बनिक व्यर्थ पदार्थों का उपयोग ही करें क्योंकि इस कंपस्ट प्रकिया में तेजी आती है। कम्पोस्ट बेड में मौसम के अनुसार नमी का स्तर बनाए रखें। कम्पोस्ट बेड या गड्ढे को धूप व वर्षा से बचाएं। कल्चर बेड को जूट की बोरी या पुआल से ढक कर रखें।

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