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धर्मच्रक परिवर्तन दिवस पर विचार गोष्टी

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  • अत्त्त दीप भवो अपना प्रकाश खुद बनों

कमलेश लव्हात्रे/बिलासपुर : आषाढी़ पूर्णिमा का महत्व ” पर योगेश मानवट ने प्रथम धम्मोपदेशना पर अपने विचार व्य्क्क्त करते हुए कहा- भारत वर्ष पूरे विश्व में ज्ञान के लिए जाना जाता है। तिथियों के आधार पर दिनों की गणना की गई है, जिसमें 15दिन कृष्ण पक्ष तथा 15दिन शुक्ल पक्ष (जिसे अंधेरा एवं उजाला पक्ष) होता है। कृष्ण पक्ष में अँधेरा होता है जिसमें अमावस की रात होती है तथा शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा आती है। भारत में पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। उनमें आषाढी़ पुर्णिमा का महत्व इसलिए ज्यादा माना गया है क्योंकि इस दिन 2500 ईसा पूर्व भगवान बुद्ध को ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहली धम्मदेशना की थी जिसे “धम्म चक्क प्रवर्तन “कहते हैं !ज्ञान प्राप्ति के पश्चात इस ज्ञान के विस्तार के लिए उन्हें अपने उन पांच साथियों की स्मृति हो आई जिनको वे छोड़कर चले गए थे। उन्होंने उसी समय यह जान लिया कि वे पांच साथी किस दिशा में गये हैं। वे उसी दिशा की ओर चल पडे़ जिसे ” सारनाथ” कहते हैं। वे गया से लगभग 300 किमी पैदल चल पडे़ तथा वहाँ पहुंचकर उन्होंने उन पांच साथियों को प्रथम धम्म देशना देने का आह्वान किया, इससे पहले इन पांच साथियों ने तथागत को अपनी ओर आता देखकर कहा कि यह साधु हमको बीच में छोड़कर चला गया है इसलिए हम उसका अभिवादन नहीं करेंगे लेकिन जैसे जैसे तथागत पास आते गये उन साथियों का ह्रदय निर्मल होता गया तब किसी साथी ने तथागत के हाथ से उनका कमंडल ले लिया किसी ने उनके चरणों को धोया किसी ने उनके बैठने के लिए आसन बिछाया इस तरह सभी साथी उनके कृतज्ञ हो गए तब तथागत भगवान बुद्ध ने अपने प्राप्त ज्ञान के विषय में बताया तब सभी साथियों ने उनके ज्ञान को आत्मसात करते हुए तथा उनको आभार प्रकट करते हूए साधु साधु साधु कहा। तब तथागत भगवान बुद्ध ने इस ज्ञान के विस्तार करने का अनुदेशन किया सभी पांच साथियों ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया और वे इस ज्ञान के प्रसारण करने का संकल्प लिया! इस ज्ञान में प्रमुखता से पंचशील ग्रहण करने एवं अष्टांग मार्ग का पालन करने देशना की गई है। इस ज्ञान को अपने जीवन में उतारकर उस ज्ञान की प्राप्ति की जा सकती है जिसे स्वयं गौतम सिद्धार्थ ने प्राप्त की! तथागत ने कहा है “अत्त दीपो भव “अपना प्रकाश स्वयं बनो!

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