तिलकराम मंडावी/डोंगरगढ़ : शहर को लंबे समय के बाद नई सड़क की सौगात मिली है। नगर पालिका के सत्ता में आनें के बाद कांग्रेस के जनप्रतिनिधियों ने निर्माण के लिए एक करोड़ 82 लाख रूपए की स्वीकृति मिलतें ही दावा किया था कि पूरी राषि से मजबूत सड़क बनाई जाएगी और इसे विवादित नहीं होनें दिया जाएगा। लेकिन नगर पालिका में सारें विकास कार्यों की तरह यह भी विवादों में षामिल हो गया। पालिका में डामर पाॅलिटिक्स चल रही है। कांग्रेस के जनप्रतिनिधि सड़क की गुणवत्ता को परखनें रोजाना निर्माण स्थल पर रहकर काम कराकर मजबूत सड़क निर्माण का दावा कर रहे है। तो वहीं विपक्षी बीजेपी के पार्शदों ने तो ठेकेदार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। विपक्षी पार्शद निर्माण की गुणवत्ता से नाखुष होकर भौतिक सत्यापन की मांग कर रहे है। नेता प्रतिपक्ष अमित छाबड़ा की मानें तो तय मापदंड के अनुरूप सड़क का निर्माण नहीं किया जा रहा है। बताया गया कि स्वीकृत राषि का दुरूपयोग पहलें ही हो चुका है और सत्ता में काबिज जनप्रतिनिधियों को कमीषन देनें के लिए ठेकेदार गुणवत्ता से समझौता कर रहा है। इधर कांग्रेस-भाजपा के जनप्रतिनिधियों के बीच चल रहे घमासान के बीच यह भी बात सामनें आ रही है कि ऐसे ठेकेदार को टेंडर दिया गया है जिसके नाम पर डामर प्लांट नहीं है। दूसरें ठेकेदार के दस्तावेज के आधार पर सड़क निर्माण का टेंडर दे दिया गया जो कि गलत है। टेंडर देने के दौरान जिम्मेदारों ने यह तक नहीं देखा कि संबंधित ठेकेदार के नाम पर डामर प्लांट नहीं है। अब यहीं विवाद की स्थिति बन रही है।
टेंडर और वर्क आॅर्डर के बाद भी काम षुरू करनें में पहलें ही देरी- सड़क निर्माण के लिए राषि स्वीकृत होनें के बाद टेंडर की पहली प्रक्रिया विवादित रही। कांग्रेसी ठेकेदारों के बीच टेंडर लेनें के लिए प्रतिस्पर्धा हुई और नतीजा यह रहा कि निविदा प्रकाषन के बावजूद टेंडर निरस्त करना पड़ गया। दोबारा टेंडर काॅल करनें की नौबत नहीं आई और विभागीय स्तर पर ही छुईखदान के ठेकेदार अभिजीत सिंग को टेंडर मिल गया। तब पदस्थ तत्कालीन प्रभारी सीएमओ पूजा पिल्ले व नियमित सीएमओ हेमषंकर देषलहरा ने डामर प्लांट के दस्तावेज जांचे बगैर ही सहमति दे दी। इधर वर्क आर्डर जारी होनें के साल भर बाद भी काम अब षुरू हुआ है।
इनकी थी जिम्मेदारी लेकिन सबनें की अपनी मनमानी
पूजा पिल्लेः नगर पालिका डोंगरगढ़ में प्रभारी सीएमओ के रूप में पूजा पिल्ले का कार्यकाल कुछ माह का रहा। उनके ही कार्यकाल में पहला टेंडर काॅल हुआ। लेकिन कांग्रेसियों की राजनीति के चलतें टेंडर निरस्त हो गया। उन्होंने दस्तावेजों की जांच करना जरूरी नहीं समझा और करीब 8 लाख रूपए फिजूलखर्ची में चलें गया। इसी दौरान उनका तबादला हो गया।
हेमषंकर देषलहराः पालिका में अब तक के सबसें विवादित सीएमओ में हेमषंकर देषलहरा का नाम रहा है। उनके कार्यकाल में ही अभिजीत सिंग को सड़क निर्माण का टेंडर जारी हुआ। टेंडर देनें के दौरान ही डामर प्लांट के दस्तावेजों की जांच होनी थी। जब अभिजीत सिंग के नाम पर प्लांट नहीं है तो उन्हें टेंडर दे दिया गया। वर्क आॅर्डर जारी होनें के साल भर बाद भी देषलहरा काम षुरू नहीं करा सकें।
कांग्रेसी बन गए ठेकेदार, अपनी ही सरकार का कर रहे बंठाधार- राज्य व षहरी सरकार के सत्ता में काबिज होनें के बाद कांग्रेस नेता व कार्यकर्ता ठेकेदार बनकर सरकारी काम कर रहे है। नगर पालिका में स्थिति यह है कि किसी भी कार्य का टेंडर लेनें के लिए कांग्रेसी ठेकेदारों को प्राथमिकता दी जा रही है। सत्ता में होनें की वजह से काम की गुणवत्ता से सीधे समझौता कर रहे है। कांग्रेसी ठेकेदारों को टेंडर देनें को लेकर पहलें भी हंगामा हो चुका है। कांग्रेसी नेता ठेकेदार बनकर अपनी ही सरकार का बंठाधार करनें में लगें हुए है।
सीधी बातः यमन देवांगन, सीएमओ नपा डोंगरगढ़
सड़क निर्माण करनें वालें ठेकेदार के नाम पर डामर प्लांट नहीं है तो कैसे टेंडर मिल गया?
मेरे ज्वाइनिंग से पहलें ही टेंडर व वर्क आर्डर हो गया था। मैंने सिर्फ काम षुरू कराया है।
विपक्षी दल के पार्शद निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़ा कर चुके है?
विपक्ष का आरोप है कि तय मापदंड के अनुरूप निर्माण नहीं हो रहा। इसके लिए संबंधित इंजीनियर को निर्देषित किया गया है।
ठेकेदार को भुगतान से पहलें भौतिक सत्यापन की मांग विपक्ष ने की है? तो क्या यह होगा?
यदि इसकी जरूरत पड़ी तो यह भी करा लेंगे।

