आफताब आलम/बलरामपुर : बलरामपुर जिले में कोरोना संक्रमण के कारण स्कूल बंद हो गया है इसी बीच ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे बच्चे अब पढ़ाई-लिखाई बंद करके महुआ चुनने को प्राथमिकता दे रहे है पहले महुआ चुन लो फिर पढ़ने जाना ठीक रहेगा। यहां गांव के बच्चे महुआ चुनकर उसको सुखाते हैं सुखने के बाद 45-50 रूपये किलो के हिसाब से गांव के ही व्यापारी को बेच देते हैं।
महुआ बेचकर घर का खर्च चला रहे हैं ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे
बलरामपुर जिले में मार्च महीने से ही महुआ के पेड़ से महुआ अब तक टपक रहा है अब जिले में महुआ अंतिम कगार पर पहुंच गया है मार्च महीने के शुरूआत से महुआ (पीला सोना) टपकना शुरू हो गया था जो कि वर्तमान में भी मई महीने के मध्य तक टपक रहा है हालांकि मार्च अप्रैल कि तुलना में अब बहुत सीमित मात्रा में महुआ टपक रहा है कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए जिले में लॉकडाउन लागू है इस बीच गांव के लोगों के बीच रोजगार संकट है आय का जरिया भी बंद है महुआ ही सहारा बना हुआ है सुदूरवर्ती इलाकों के ग्रामीण महुआ को आर्थिक उपार्जन का अच्छा साधन मानते हैं। फिलहाल महुआ पचास से साठ रुपए प्रतिकलो बिक रहा है। महुआ से ग्रामीणों का छह माह का राशन जुगाड़ हो जाता है।
महुआ आदिवासी और ग्रामीण खानपान में आज भी रचा बसा है। यह एक भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में बड़े पैमाने पर पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम है मधुका इंडिका । यह एक तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष है

