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जैजैपुर विधायक ने उठाया छत्तीसगढी संस्कृति और विकास का प्रश्न

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दिलहरण चंद्रा/ जैजेपुर : जैजेपुर विधायक केशव चंद्रा ने शीतकालीन विधानसभा सत्र के चौथे दिन गोधन न्याय योजना एवं छत्तीसगढ़ के किसानों एवं मजदूरों की समस्या को विधानसभा में उठाया । विधानसभा सत्र से मिली जानकारी के अनुसार जैजैपुर विधायक केशव चंद्रा ने विधानसभा में छत्तीसगढ़ के किसानों एवं मजदूरों के दर्द को साझा करते हुए कहा  कि क्या छत्तीसगढ़ के मजदूर केवल धूल- मिटटी खाने और मजदूरी करने के लिए है । दूध की मलाई खाने के लिए बाहर के अधिकारी और कर्मचारियों का ठेका है । यह व्यंग्य उन्होंने बड़े – बड़े उद्योगों में छत्तीसगढ़िया लोगों के न्यनतम हिस्सेदारी  को देख कर कहा है। उन्होंने कहा है कि यहाँ बड़े –  बड़े उद्योग लग तो रहे हैं परंतु उन उद्योगों में छत्तीसगढ़िया लोगों की भागीदारी न्यूनतम है । बड़े बड़े उद्योगों में छत्तीसगढ़ मजदूर बन कर रहा है और बड़े पदों पर बाहर से आए हुए लोग काम कर रहे हैं । जब इस विषय पर जैजैपुर विधायक केशव चंद्रा बोल रहे थे और उन्होंने यह कहा कि राजस्थान , बंगाल , बिहार आदि से आए हुए लोग मलाईदार पदों पर बैठे हुए हैं और छत्तीसगढ़िया मजदूर बन कर रहा है । उनकी इस टिप्पणी पर विधायक मोहम्मद अकबर तल्ख हो गए और उन्होंने तुरंत पलटवार करते हुए उन्हें भी गैर छत्तीसगढ़िया घोषित कर दिया ।
गोधन न्याय योजना से केवल व्यापारियो को लाभ
गोधन न्याय योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि गोधन न्याय योजना केवल बड़े व्यापारियों के लिए लाभदायक रह गया है और यह छत्तीसगढ़िया लोगों को लाभ बिल्कुल भी नहीं पहुंचा रहा है । उन्होंने अपने क्षेत्र के गांव खजुरानी का उदाहरण देते हुए बताया कि खजुरानी के स्व सहायता समूह की महिलाओं ने 2 क्विंटल गोबर खाद से कंपोस्ट खाद बनाया और उन्होंने आकर विधायक केशव चंद्रा को इस विषय में अवगत कराया तब उन्होंने संबंधित अधिकारी को गोबर बिकवाने के लिए आग्रह किया परंतु की खजुरानी की स्व सहायता समूह की महिलाओं को फायदा तो दूर खाद को ले जाने के लिए मजदूरी देनी पडी़ थी । छत्तीसगढ़ी में कहें तो लाद दे लदा दे घर तक पहुँचा दे  वाला किस्सा खजुरानीे की महिला स्व सहायता समूह की महिलाओ केे साथ हुआ था । इसी तरह उन्होंने धान की किस्त पर भी उपाध्यक्ष महोदय से कहा कि किसानों की धान की किस्त जल्दी ही मिल जानी चाहिए ।  किसानो को धान की किस्तो के लिए तरसाना नहीं चाहिए परंतु उपाध्यक्ष ने यह कहते हुए उन्हें संतुष्ट कराया कि हर वर्ष आखिर धान कीे किस्ते किसान के खाते में आ तो रही हैं परंतु वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि किसानों को किस्त – किस्त में किस्त देने से वह केवल किस्त ही रह जाती है बड़ी राशि नहीं बन पाती है ।
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